ग़ज़ल
"कब बच्चे बड़े हो गए"
सुबह की धूप में कितने सुनहरे सिलसिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
जो उँगली थामकर मेरी कभी चलना सीखे,
न जाने किस दिशा में आज वो आगे चले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
उन्हीं की हँसी से रोशन था मेरा आँगन,
उन्हीं की धुन में दिन बीते, उन्हीं में शाम ढले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
जो अपने ख़्वाब पूरे करने में हरदम लगे,
हम अपने सारे अरमाँ उनके संग ही पले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
न धूपों का था डर कोई, न बारिशों का ख़ौफ़,
मोहब्बतों के परिंदे थे, मोहब्बतों में खिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
वही घोंसला है, शाखें हैं, वही पुराना चमन,
मगर वो नन्हे परिंदे न फिर कभी आ मिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
मैं आज भी कभी खिड़की से झाँक लेता हूँ,
कई बरस हैं मगर दिल के ज़ख़्म कहाँ सिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
वो प्रौढ़-सा जोड़ा अब भी वहीं ठहरा है,
निगाह पूछती है किसलिए ये फ़ासले मिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
कहा उन्होंने — "उड़ानों का यही दस्तूर है,
जो पर मिले तो परिंदे भी कहाँ घर में रहे",
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।
समय की रेत को मुट्ठी में कौन बाँध सका,
शिव' आज भी उसी घोंसले के पास खड़ा,
जहाँ कभी हज़ारों चहकते हुए पल मिले,
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