सावन की कसमसाहट
~~ शिव मिश्रा
ये सावन जा रहा है, मुझसे कह रहा है,
भीगने में जो मज़ा है, वह बचने में कहाँ है।
कुछ देर ठहर जाओ, ये मेरी इल्तज़ा है,
कागज़ की नाव का वो, मौसम बुला रहा है।
मिट्टी की सोंधी खुशबू, जैसे कोई नशा है,
भीगा हुआ वो बचपन, सावन में आ बसा है।
अब छतरियों के नीचे, जो अक्स छुप रहा है,
लगता है ज़िंदगानी से, थोड़ा खफ़ा-खफ़ा है।
रुक कर ज़रा नहा लो, ये वक़्त कह रहा है,
सब उलझनों की शायद, बारिश ही इक दवा है।
खिड़की के काँच पर जो, पानी फिसल रहा है,
तेरी छुअन का दिल को, एहसास दे रहा है।
पर्दे से झांकने की, वो जो तेरी हया है,
ये भीगता सा मौसम, उस पर ही तो टिका है।
भीगी हुई लटों से, पानी टपक रहा है,
मेरे करीब आ जा, मौसम की ये रज़ा है।
तेरी नज़र का जादू, बारिश में घुल रहा है,
तेरे बिना ये सावन, मेरे लिए सज़ा है।
सीने से लग के तेरे, छुपने में जो मज़ा है,
दुनिया की हर नज़र से, बचने की ये अदा है।
ठंडी हवा का झोंका, जब भी गुज़र रहा है,
बस तेरी धड़कनों का पैगाम ला रहा है।
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- शिव मिश्र
मूलकृति - रक्षा बंधन , २८ अगस्त २०२६
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