Sunday, August 23, 2026

कालजयी स्वर


          

 कालजयी स्वर

~ शिव मिश्रा

 

(१)

कवि समय का दास कब है?

वह स्वयं इतिहास है!

काल के पृष्ठों पे अंकित,

चेतना का भास है।

सृष्टि के हर एक युग को,

अर्थ जिसने दे दिया;

वह नियति का लेख है,

 वह सत्य का आकाश है।

 

(२)

 शब्द जब तप में तपें,

तो वेदना वरदान होती;

मौन जब गंगा बने,

वाणी स्वयं प्रमाण होती।

तप्त अक्षर मन्त्र बनकर,

 युग-हृदय को हैं जगाते;

अश्रु ही पावन सलिल बन,

लोक-मन को हैं नहलाते।

 

(३)

 पीड़ितों की आह को,

जब गूँथता है छन्द में;

 वह उतरता है तभी,

 सृष्टि के आनन्द में।

पी हलाहल इस जगत् का,

अमृत सभी को बाँटता;

 लेखनी की धार से,

तम का समंदर काटता।

 

(४)

 राजसत्ताएँ ढहीं,

सब मुकुट मिट्टी में मिले;

पर समय की राख में,

काव्य के शतदल खिले।

शस्त्र जब थक कर झुके,

तब शब्द ने पाई विजय;

कवि जहाँ भी गा उठा,

सृष्टि हो जाती अभय।

 

(५)

 दीप जलते ही नहीं,

 युग की दिशा भी खोलते हैं;

मौन पन्नों पर उतरकर,

सत्य बनकर बोलते हैं।

कवि समय का दास नहीं,

वह युग-चेतना का शंख है;

 बाँध ले जो व्योम को,

वह कल्पना का पंख है।

 

(६)

काल कहाँ कवि को बाँधे?

वह तो कालजयी स्वर है;

मात्र दीपक वह नहीं,

दिशाओं का दिव्य प्रखर स्वर है।

एक माटी का दीया कब?

सूर्य की संतान है वह;

हर प्रलय के बाद भी,

जो शेष है, वह गान है वह।

                                ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

 शिव प्रकाश मिश्रा  

                                  मूल कृति - दीपावली २०२४  

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