Saturday, August 22, 2026

सरिता, सिंधु और समय

        सरिता, सिंधु और समय

                                 ~ शिव मिश्रा 


काल निरंतर चलता रहता, सोता कभी न एक प्रहर,

अनगिन युग आते-जाते हैं, अविचल बहती समय-नहर।

थकती केवल देह मनुज की, हाँफ रही हैं साँसें ही,

तृष्णा के भारी बोझ तले, उलझी मन की आशाएं ही।

पहिया घूम रहा सृष्टि का, कभी न रुकती जिसकी चाल,

हम ही थककर बैठ गए हैं, ओढ़ व्यथा की सूखी शाल।

सूर्य कभी भी डूब न पाता, वह तो पावक का उद्गम,

केवल हमारी दृष्टि मुड़ी है, फैला मन में अंधा भ्रम।

जिसको हम तम-घिरी निशा कह, नयनों में भय भरते हैं,

छाया के इस खेल-तमाशे पर हम आहें भरते हैं।

वही तिमिर की चादर ओझल, दूजी दिशि में होती है,

दूजे अम्बर वही रश्मियाँ, नूतन किरणें बोती हैं।

जो संध्या का मौन यहाँ है, वहाँ अरुण प्रभात लिए,

अंत नहीं कुछ भी जग में, बस दृष्टि अपने भेद किए।

पर्वत के उर से जन्मी थी, कल-कल करती चंचल धार,

कंकड़-पत्थर पार किए सब, सींचे कितने खेत-कछार।

चलते-चलते मार्ग थका जब, सम्मुख देखा सिंधु अपार,

सहम उठी सरिता पल भर को, सोच रही थी बारम्बार—

"कहाँ समाएगा अस्तित्व मेरा? क्या खो जाएगी पहचान?

कहाँ विसर्जित होगी मेरी, धारा, गति और मेरा गान?

क्या यह विशाल तटहीन समंदर, केवल मेरा संहार है?

या मेरे युग-युग की गति का, बस इतना ही विस्तार है?"

हँसा सिंधु अम्बर-सा गहरा, अपनी बाहें खोल विराट,

बोला— "ओ भोली सरिता! क्यों डरती छूने को यह घाट?

जहाँ छोड़ दोगी तुम अपने, संकीर्ण तटों का यह अभिमान,

वहीं प्राप्त कर लोगी विस्तृत, इस असीम जल का वरदान।

तुम मिटती कब हो धारा में? तुम तो सिंधु बनोगी अब,

सीमाओं के बंधन तजकर, स्वयं अनन्त बनोगी अब।"

खो जाना कोई अंत नहीं है, यह तो केवल विस्तार है,

बूँद अगर जल-निधि में खोए, वही सिंधु की धार है।

विराम केवल एक संधि है, नूतन गति के गान की,

मिटना तो बस इक यात्रा है, स्वयं को अनन्त बनाने की।

अलसाया मन जग उठता है, जब दृष्टि विराट हो जाती है,

हर संध्या की गोद से ही फिर, स्वर्णिम भोर मुस्काती है।

                     ~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~ 

                         मूल कृति  मई २०२५  



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