Tuesday, December 23, 2025

चूहे

“चूहे”

रात के सन्नाटे में घर बहुत शांत लगता था।
इतना शांत कि दीवारों की साँसें भी सुनाई देने लगती थीं।

और तभी—
एक हल्की-सी खड़खड़ाहट।

पहले लगा, शायद हवा होगी।
फिर लगा, पुरानी लकड़ी का कोई टुकड़ा हिला होगा।
लेकिन आवाज़ लौटकर फिर आई—
नन्हे, तेज़ क़दमों की।

चूहे।

वे दिखाई नहीं देते थे,
लेकिन उनकी मौजूदगी हर जगह महसूस होती थी—
रसोई के कोने में,
अलमारी के नीचे,
और मन के भीतर भी।

मैंने सोचा, उन्हें नज़रअंदाज़ कर दूँ।
पर जितना उन्हें अनदेखा किया,
उतना ही वे बढ़ते गए—
आवाज़ों में,
निशानों में,
और डर में।

रातों की नींद टूटने लगी।
हर छोटी-सी आवाज़ एक चेतावनी बन गई।
दिल तेज़ धड़कने लगा—
जैसे घर अब मेरा नहीं रहा।

मैंने उपाय किए—
जाल लगाए,
दरारें बंद कीं,
कमरे साफ़ किए।

लेकिन असली समस्या
चूहों से ज़्यादा
मेरे मन में थी।

क्योंकि चूहे सिर्फ़ घर में नहीं थे—
वे चिंता बनकर
मेरे भीतर घूम रहे थे।

एक दिन समझ आया—
डर से लड़ने के लिए
हर चीज़ को खत्म करना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ डर बस यह याद दिलाने आते हैं
कि हम कितने नाज़ुक हैं।

उस रात फिर आवाज़ आई।
मैं चौंका नहीं।

मैंने गहरी साँस ली
और अँधेरे को वैसे ही रहने दिया।

कभी-कभी
डर को पहचान लेना ही
काफ़ी होता है।

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   - शिव मिश्रा 

( Lydia Davis की कहानी  The Mice से प्रेरित )

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