कोरोना : को(ई) रो(ये) ना
— शिव प्रकाश मिश्रा
कभी जिसे स्वीकार न कर पाया,
वह आज अपने आप समझ में आया।
न कोई अपना है और न कोई पराया,
व्यर्थ है मोह, मिथ्या है सब माया!
वे सब अपने हैं जो हमें अपना मानते हैं,
आखिर अपनेपन का अहसास तो हम सभी जानते हैं।
अब तक क्या खोया और क्या पाया?
इस कोरोना संकट ने अच्छी तरह समझाया।
जीवन की चाहत ने और चाहत के भय ने,
कितने ही अपनों को, अपनों नें ही ठुकराया!
ये सही है, दिखाई दी है कहीं-कहीं एकजुटता,
और पारंपरिक पारिवारिक समरसता,
पता नहीं, ये अनजाना भय है या सचमुच एकात्मता?
बहुत सोचा, समझा और निर्णय किया,
भारी मन से सबने अपनी जड़ों की ओर पलायन किया।
दूर-दराज से, छूटते हुए अपने रोज़गार और काम से,
व्याकुल होकर उस अनजाने महामारी के नाम से।
चिलचिलाती जेठ की धूप और अंतहीन सड़कों पर बढ़ते पाँव,
पैरों के छाले ढूंढ रहे थे बस अपनी मिट्टी की छाँव।
सिर पर बंधी गृहस्थी की पोटली, कंधे पर सोए मासूम बच्चे,
टूट गए सब महानगरीय भ्रम, बस अपनी ही धरती के रिश्ते निकले सच्चे!
चलो...! लौट चलते हैं वहाँ जहाँ माँ है,
ममता है, प्यार है, परिवार है,
शायद यही सच्चा संसार है,
और सुरक्षा कवच भी है यही!
पर यह बात भी है बिल्कुल सही,
कि जीविका भले यहाँ है नहीं,
पर जीवन! उतना परेशान नहीं।
मिल-बैठकर करेंगे उन समस्याओं के हल,
जो आज हैं धुंधली, पर कल होंगी सरल।
शायद इस संकट में ही छिपा हो हर संकट का समाधान,
चलो! शुरू करें एक नया अभियान...
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- शिव मिश्रा
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८ मई २०२०
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