Wednesday, July 12, 2023

प्यार की दुकान


प्यार की दुकान

हर तरफ़ नफ़रत ही नफ़रत फैलाई गई है यहाँ,
दम घुटता है — साँस लेने में भी डर लगता है।

ढूँढ़ता हूँ कि मिल जाए मोहब्बत का ढाबा कहीं,
भूख से डरता हूँ, पर कुछ खाने का मन करता है।

हो रहा है जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग यहाँ,
अब तो कुछ करते नहीं, फिर भी डर लगता है।

मीडिया बिक चुका, ख़तरे में है संविधान यहाँ,
क्या करें — इस देश में रहने में भी डर लगता है।

न रोज़गार है और न बचा आय का साधन कोई,
अब तो भाईचारे की खेती से भी डर लगता है।

नफ़रती बाज़ार में खोली है प्यार की दुकान हमने,
न जाने क्यों खरीदार को आने में भी डर लगता है।

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    - शिव मिश्रा 

दिनांक- ५ जनवरी २०२३       

 

       

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