Tuesday, May 26, 2026

मां अगर तुम न होती ....

माँ, अगर तुम न होती

माँअगर तुम न होती,

तो मैं ही कहाँ होता?

इन साँसों की डोरी में,

कोई नाम कहाँ होता?

जब इस दुनिया में आया,

तुमने ही गले लगाया,

मेरे देखे हर सपने को,

तुमने ही तो सजाया।

 

तेरी उँगली को थामे ही,

मैंने चलना सीखा है

तेरी ममता की छाँव में

हर दर्द मेरा फीका है।


 जब रोया मैं रातों में

लोरी गाकर सुलाया है

मेरी सूनी  दुनिया को

आँचल से सजाया है।


तेरी गोदी का वो झूला

हर ख़ुशी से बढ़कर प्यारा है

भटकूँ जब इस दुनिया में,

तू ही मेरा ध्रुवतारा है।


मेरी हर एक शरारत  को

हँसकर तुमने माफ़ किया

मेरे जीवन के रस्ते को,

अपने अश्कों से साफ़ किया।

मेरी अंधियारी राहों में,

दीपक सा तुम जलती हो,

जीवन की हर ठोकर पर

ममता बनकर मिलती हो।

भूखा ही रह  जाता मैं,

यदि तेरी ममता न मिलती,

सूनी पड़  जाती यह  दुनिया

आँचल की छाँव नहीं  मिलती।

मेरी पहली भाषा हो तुम,

विश्वास की परिभाषा हो तुम,

मुझमें जो कुछ भी अच्छा है,

उसकी रचनाकार हो तुम ।

 

हर संकटहर मुश्किल में

तेरे आशीष बचाते हैं,

मैं जब भी गिर जाता हूँ,

तेरे हौसले उठाते हैं।

मेरी हर मिली सफलता पर

मुझसे ज्यादा तुम खिलती हो,

मेरी हर छोटी पीड़ा में

मुझसे ज्यादा तुम रोती हो।

मेरी समझशब्द और स्वर

सब तेरी ही तो थाती हैं,

जो कुछ भी मैं लिख पाता हूँ,

तेरे संस्कारों की बाती हैं।

 

तेरी रोशनी से राह मिलती है

वरना इस भीड़ में खो जाता मैं कहीं,

हर सांस में तेरा ही अहसास है,

बस तेरे होने से हूँ मैं यहीं।


खुशियाँ सारी इस जग की,

तेरे कदमों में लाकर रख दूँ,

अगर मिले मुझको  मौका ,

तो अपनी उम्र भी तुझको दे दूँ।


माँतुम केवल रिश्ता नहीं,

मेरे जीवन का आधार हो,

ईश्वर मुझे मिले न मिले,

तुम मेरे लिए अवतार हो।


तू ही मेरी पूजा है माँ

तू ही मेरा भगवान है

तेरे ही दम से चलती

इस बच्चे की जान है।


माँअगर तुम न होती,

तो मैं ही कहाँ होता?

भीड़  भरी  इस दुनिया में

मेरा नामो-निशाँ न होता।

 

माँअगर तुम न होती,

तो मैं ही कहाँ होता?

इन साँसों की डोरी में,

कोई नाम कहाँ होता?

~~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~

 


 


Tuesday, December 23, 2025

चूहे

“चूहे”

रात के सन्नाटे में घर बहुत शांत लगता था।
इतना शांत कि दीवारों की साँसें भी सुनाई देने लगती थीं।

और तभी—
एक हल्की-सी खड़खड़ाहट।

पहले लगा, शायद हवा होगी।
फिर लगा, पुरानी लकड़ी का कोई टुकड़ा हिला होगा।
लेकिन आवाज़ लौटकर फिर आई—
नन्हे, तेज़ क़दमों की।

चूहे।

वे दिखाई नहीं देते थे,
लेकिन उनकी मौजूदगी हर जगह महसूस होती थी—
रसोई के कोने में,
अलमारी के नीचे,
और मन के भीतर भी।

मैंने सोचा, उन्हें नज़रअंदाज़ कर दूँ।
पर जितना उन्हें अनदेखा किया,
उतना ही वे बढ़ते गए—
आवाज़ों में,
निशानों में,
और डर में।

रातों की नींद टूटने लगी।
हर छोटी-सी आवाज़ एक चेतावनी बन गई।
दिल तेज़ धड़कने लगा—
जैसे घर अब मेरा नहीं रहा।

मैंने उपाय किए—
जाल लगाए,
दरारें बंद कीं,
कमरे साफ़ किए।

लेकिन असली समस्या
चूहों से ज़्यादा
मेरे मन में थी।

क्योंकि चूहे सिर्फ़ घर में नहीं थे—
वे चिंता बनकर
मेरे भीतर घूम रहे थे।

एक दिन समझ आया—
डर से लड़ने के लिए
हर चीज़ को खत्म करना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ डर बस यह याद दिलाने आते हैं
कि हम कितने नाज़ुक हैं।

उस रात फिर आवाज़ आई।
मैं चौंका नहीं।

मैंने गहरी साँस ली
और अँधेरे को वैसे ही रहने दिया।

कभी-कभी
डर को पहचान लेना ही
काफ़ी होता है।

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   - शिव मिश्रा 

( Lydia Davis की कहानी  The Mice से प्रेरित )

Sunday, March 9, 2025

छोटा सा बादल

विस्मित  मुस्कान हो,
    लाल आसमान हो,
        पलकें  उठें  झुकें,
            लब थर-थराएँ रुकें ,
                पास तुम बैठी रहो,
                    लहराती आंचल. II1II

गुल मोहर खिले कहीं
    दो पल मिलें कहीं
        और एक साथ गिनें
            हृदय की धडकनें 
                चांदनी ढके रहे
                    छोटा सा बादल.. II2II


****शिव प्रकाश मिश्र ******

              ( मूल कृति जुलाई १९८०)  

तुम्हारी हंसी...



है फूलों-सी नाज़ुक तुम्हारी हँसी,

 कितनी प्यारी दुलारी तुम्हारी हँसी।

ज़िन्दगी धूप में तप रही रेत है,

 प्यार की छाँव देती तुम्हारी हँसी।

कोई सावन कहीं झूम के आ गया,

 है फुहार-सी झरती तुम्हारी हँसी।

मन पपीहा-सा व्याकुल फिरे घूमता,

 है स्वाति की बूँद तुम्हारी हँसी।

चाँद बादल में जाने कहाँ जा छिपा, 

है सितारों का उपवन तुम्हारी हँसी।

एक उफनती नदी तोड़ बंधन चली,

 मोहक झरने बनाती तुम्हारी हँसी।

मोर जंगल में नाचे प्रकृति खिल उठे, 

और घुँघरू बजाती तुम्हारी हँसी।

मृग बन मन भटक ढूँढ़ता फिर रहा, 

कोष कस्तूरी का है तुम्हारी हँसी।

सुर्ख जोड़ा पहन एक दुल्हन सजी, 

कंगनों-सी खनकती तुम्हारी हँसी।

एक तूफ़ान आकर कहीं थम गया, 

शोख़ बिजली गिराती तुम्हारी हँसी।

शब्द होंठों पे आयें न आया करें, 

मूक आमंत्रण देती तुम्हारी हँसी।

दिल की अमराइयों में बसंत आ गया

कूक कोयल की मीठी तुम्हारी हँसी।

तुम रहो न रहो ये रहेगी हँसी, 

रोज़ मुझको रुलाती तुम्हारी हँसी।


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--शिव प्रकाश मिश्र

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